M.K.SINGH( PRESS)

रविवार, 12 जुलाई 2020

#GKP...BJP क्षेत्रीय कार्यालय महामंत्री शिवसागर तिवारी

#GKP- उपेंदर दत्त शुक्ला,

#GKP -भाकियू जिलाध्यक्ष विनय कुमार शुक्ला ने लाकडाउन पर रखा विचार

#आजमगढ़..कन्टेनमेंट जोन घोषित हुआ

#गोरखपुर-वाराणसी फोरलेन निर्माण कार्य मे की जा रही लापरवाही को लेकर भाकि...

#gkp.. पुलिस ने लाकडाउन का पालन जोरो से करा रही है

#GKP..वृक्षारोपण पर लालमोहन यादव के अच्छे विचार.m

#GKP..सामाजिक समस्या पर शिवप्रताप शुक्ला के विचार|

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

प्रियांश सिंह पुत्र मनोज सिंह- आज़मगढ़

26जनवरी2020 - प्रियांश सिंह।
71वॉ गणतंत्र दिवस के शुभावसर पर खुशियों का एक पल!

गणतंत्र दिवस 2020 के शुभावसर पर बाबू प्रियांश सिंह और भाई घनश्याम सिंह के साथ एक फोटो!

26/01/2020

26/01/2020



मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

गोरखपुर...। भक्ति और आस्था का केंद्र है माँ तरकुलहा देवी।

भक्ति और आस्था का केंद्र है माँ तरकुलहा देवी।  


रिपोर्ट- मनोज सिंह/आज़मगढ़
    गोरखपुर..।  आस्था और भक्ति का गहरा संबंध है, क्योंकि आस्था भक्ति मार्ग का पहला सौपान है, जो भक्ति को जागृत करता है। बिना आस्था के भक्ति माता के दर्शन असंभव है।
        उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद अंतर्गत तहसील व थाना चौरीचौरा क्षेत्र के देवीपुर गांव में चर्चित माँ तरकुलहा देवी मंदिर वर्ष 1940ई0 में स्थापित हुआ था। यह मंदिर गोरखपुर जिला मुख्यालय से लगभग 22 किलोमीटर देवरिया रोड पर फुटहवा इनार के पास मंदिर मार्ग का मुख्य गेट है। वहां से मंदिर की दूरी लगभग डेढ़ किमी है। तरकुलहा देवी मंदिर के दरबार में जाने के लिए हर समय साधन मौजूद हैं। यह प्रमुख धार्मिक और पर्यटक स्थल है। हर साल बड़ी तादाद में लोग यहां आते हैं। इस मंदिर के पास ही बाबू बंधू सिंह का स्मारक है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है, यहां प्रसाद में मिलने वाला बकरे का मांस। इसे देश का एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां इस तरह की परंपरा प्रचलित है। चैत्र राम नवमी से एक माह का मेला लगता है, और यहां सौ से अधिक दुकानें स्थायी हैं और रोज मेले का दृश्य होता है। लोग पिकनिक मनाने भी यहां आते हैं। मुंडन, जनेऊ व अन्य संस्कार भी स्थल पर होते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर लोग बकरे की बलि देते हैं। और यहां मंदिर में घंटी बांधनते है। मंदिर परिसर में चारों ओर घंटियां देखने को मिल जाएगी। मन्नतें पूरा होने पर लोग अपनी क्षमता के अनुसार घंटी बांधते हैं।


          बतादें कि कभी घने जंगलों में विराजमान सुप्रसिद्ध मां तरकुलहा देवी मंदिर आज तीर्थ के रूप में विकसित हो चुका है। हर साल लाखों श्रद्धालु मां का आशीर्वाद पाने के लिए आते हैं। मां भगवती का यह मंदिर कभी स्वतंत्रता संग्राम का भी एक प्रमुख हिस्सा रहा है। उस समय मंदिर के पुजारी देवीपुर गांव के धिसियावन दास थे। जहां जंगल के बीच पिण्डी के रूप में मां तरकुलहा देवी की पूजा-अर्चना करते थे। विक्रम बहादुर सिंह उर्फ बच्चा बाबू भी मां की पूजा करने आते थे। इसके बाद विशेश्वर दास और तूफानी दास मंदिर के पुजारी रहे। वर्तमान समय में पंडित दिनेश तिवारी पुजारी के रूप में कार्यरत हैं। मंदिर के पुजारी दिनेश तिवारी ने बताया कि- “आजादी की लड़ाई में भी इस मंदिर का बहुत बड़ा योगदान रहा है। अंग्रेज भारतीयों पर बहुत अत्याचार करते थे। डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह बहुत बड़े देशभक्त थे। वह अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंके हुए थे। बंधु सिंह मां के भी बहुत बड़े भक्त थे। 1857 के आसपास की बात है। जब पूरे देश में आजादी की पहली हुंकार देश में उठी। गुरिल्ला युद्ध में माहिर बाबू बंधू सिंह भी उसमें शामिल हो गए।  वह घने जंगल में अपना ठिकाना बनाए हुए थे। जंगल से ही गुर्रा नदी गुजरती थी। उसी जंगल में बंधू एक तरकुल के पेड़ के नीचे पिंडियों को बनाकर मां भगवती की पूजा करते थे। अंग्रेजों से गुरिल्ला युद्ध लड़ते और मां के चरणों में उनकी बलि चढ़ाते। इसकी भनक अंग्रेजों को लग गई। उन्होंने अपने गुप्तचर लगाए। अंग्रेजों की चाल कामयाब हुई और एक गद्दार ने बाबू बंधू सिंह के गुरिल्लाा युद्ध और बलि के बारे में जानकारी दे दी। फिर अंग्रेजों ने जाल बिछाकर वीर सेनानी को पकड़ लिया। छह बार टूटा फांसी का फंदातरकुलहा देवी के भक्त बाबू बंधू सिंह पर अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया। अंग्रेज जज ने उनको फांसी की सजा सुनाई। फिर उनको सार्वजनिक रूप से फांसी देने का फैसला लिया गया ताकि कोई फिर बगावत न कर सके। 12 अगस्त 1857ई0 को गोरखपुर के अली नगर चौराहे पर बंधू सिंह के गले में जल्लाद ने जैसे ही फंदा डालकर लीवर खींचा फंदा टूट गया। छह बार जल्लाद ने फांसी पर उनको चढ़ाया लेकिन हर बार मजबूत से मजबूत फंदा टूटता गया। अंग्रेज परेशान हो गए। जल्लाद भी पसीने-पसीने होने लगा। जल्लाद गिड़गिड़ाने लगा, कि अगर वह फांसी नहीं दे सका तो उसे अंग्रेज फांसी पर चढ़ा देंगे। इसके बाद बंधू सिंह ने मां तरकुलहा देवी को गुहार लगाई और प्रार्थना कर कहा कि उनको फांसी पर चढ़ जाने दें। उनकी प्रार्थना के बाद सातवीं बार जल्लाद ने जब फांसी पर चढ़ाया तो उनकी फांसी हो सकी। इस घटना के बाद मां तरकुलहा देवी का महात्म दूर दराज तक पहुंचा और धीरे-धीरे भक्तों की संख्या माँ के दरबार मे बढ़ने लगी।“ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने माँ तरकुलहा देवी का दर्शन कर 2.14 करोड़ रुपये की लागत से पयर्टन विकास की परियोजनाओं का शिलान्यास किए है, और तरकुलहा माता मंदिर के इस प्रोजेक्ट के लिए सरकार ने 88 लाख रुपये कार्यदायी संस्था को जारी कर दिए हैं।


गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

पी0बी0 न्यूज़ 24 स्टूडियो का उद्घाटन समारोह सम्पन्न।

पी0बी0 न्यूज़ 24 स्टूडियो का उद्घाटन समारोह सम्पन्न।


रिपोर्ट- मनोज सिंह/आज़मगढ़।                       (दिनांक-06/10/2019)      

   गोरखपुर…। रविवार को  नवरात्र के पर्व पर प्रणाम भारत न्यूज़ व पी0बी0 न्यूज 24 के न्यूज़ स्टूडियो का उद्घाटन किया गया। कार्यालय का उद्घाटन मुख्य अतिथि प्रणाम भारत न्यूज़ के प्रधान सम्पादक डॉ. सुरेश सिंह, विशिष्ट अतिथि डॉ. शैलेन्द्र सिंह व पी0बी0 न्यूज़ 24 के सम्पादक डॉ. शत्रुधन सिंह ने फीता काट कर किया। इस दौरान मुख्य अतिथि ने कहा कि- चैनल में इंटरव्यू, दिव्यांगों के लिए चलने वाली विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी, धार्मिक और सामाजिक खबरों के अलावा अन्य किसी विषय का प्रसारण नहीं किया जाएगा। विशिष्ट अतिथि ने कहा, कि- “ ‘बिना तनख्वाह लोगों की न्यूजों को लगवाता हूँ, तब जाकर मैं एक पत्रकार कहलाता हूँ।‘ यह बड़े सौभाग्य की बात है, कि अपने चैनल में एक नई कामयाबी शुरू हो रही हैं। यह निरन्तर बढ़ती रहेगी।“ वहीं पर डॉ0 शत्रुधन सिंह ने पत्रकारिता पर चर्चा करते हुए कहा कि- “कलम की धार ही पत्रकार की वास्तविक पहचान है। पत्रकारिता में साहस, धैर्य एवं संयम जैसे गुण ही संवदेनशील व जिम्मेदार बनाते हैं। भाषा, विचार, विषय एवं संवाद ही पत्रकारिता की परिभाषा, दशा और दिशा तय करते हैं।“ उदघाटन के अवसर पर मिशन पहल की शुरुआत एवं शुभ आरंभ किया गया। जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के वीर जवानों, किसानों, अपने से छोटे- बड़े नवजवानों, बुजुर्गों, राष्ट्रीय धरोहर को सम्मान करना एवं सभी जाति, धर्म को समानता प्रदान करना और उद्देश्य का मुख्य आधार 'पेड़ लगाओ, जल बचाओ' की मुहिम की शुरुआत की गई। इस मौके पर गोरखपुर, महाराजगंज, बस्ती, खलीलाबाद, मऊ, आजमगढ़, कुशीनगर, संतकबीरनगर एवं अन्य जनपदों से पत्रकारगण- हरेंद्र यादव, बी0पी0 मिश्रा, रविन्द्र शर्मा, सुनील शाही, जितेंद्र, मनोज सिंह, नरसिंह यादव, रामाशीष, नुरुल्लाह खाँ, दिलशाद अहमद, परमात्मा गुप्ता, अमित, श्रीवास्तव, नागेन्द्र सिंह, रवि प्रकाश,  शक्ति तिवारी, धर्मेंद्र कुमार, योगेश, गोलू आदि मौजूद थे।

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

खण्ड- 1 संचार की भूमिका।

                                                                   संचार

                                  (Communication)

                   संचार (Communication) शब्द लैटिन भाषा के कम्युनिस (Communis) से बना है जिसका अर्थ है to impart, make common । मन के विचारों व भावों का आदान-प्रदान करना अथवा विचारों को सर्वसामान्य बनाकर दूसरों के साथ बाँटना ही संचार है। संचार शब्द, अंग्रेजी भाषा के शब्द का हिन्दी रूपान्तरण है। जिसका विकास Commune शब्द से हुआ है। जिसका अर्थ है अदान-प्रदान करना अर्थात बाँटना। संचार एक आधुनिक विषय है। मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, समाज कार्य जैसे विषयों से इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध है।                 
                    “ जब दो या दो से अधिक व्यक्ति आपस में कुछ सार्थक चिह्नों, संकेतों या प्रतीकों के माध्यम से विचारों या भावनाओं का आदान-प्रदान करते हैं, तो उसे संचार कहते हैं।“
Communication refers to the act by one or more persons of sending and receiving messages – distorted by noise-with some effect and some opportunity for feedback
         
                          हमारे पास संचार के सबसे प्रबल माध्यम में हमारी आवाज और भाषा है और इसके वाहक के रूप में पत्र, टेलीफोन, फैक्स, टेलीग्राम, मोबाइल तथा इन्टरनेट इत्यादि हैं | संचार का उद्देश्य संदेशो तथा विचारो का आदान प्रदान है| सम्पूर्ण मानव सभ्यता इसी संचार पर आधारित है तथा इस संचार को तेज व सरल बनाने के लिए सूचना प्रोद्योगिकी का जन्म हुआ| कंप्यूटर, मोबाइल, इन्टरनेट सबका अविष्कार इसी संचार के लिए हुआ | इन्टरनेट एक ऐसा सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा हम पूरी दुनिया में कही भी व किसी भी समय कम से कम समय व कम से कम खर्च में सूचनाओ व विचारो का आदान प्रदान कर सकते हैं|


संचार की अवधारणा 
( Concept of communication ):-
                                                                                    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और संचार करना उसकी प्रकृति है। अपने भावों व विचारों का अदान-प्रदाHन करना उसकी जन्मजात प्रकृति है। ऐसा माना जा सकता है कि मानव के अस्तित्व में आने के साथ ही संचार की आवश्यकता का अनुभव हो गया हो गया होगा। जो कि मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता हो गया। संचार किसी भी समाज के लिए अति आवश्यक है। जो स्थान शरीर के लिये भोजन का है, वही समाज व्यवस्था में संचार का है। मानव का शारीरिक एवं मानसिक विकास पूरी तरह से संचार-प्रक्रिया से जुड़ा रहता है । जन्म से मृत्यु तक मनुष्य एक दूसरे से बातचीत के माध्यम से सम्बद्ध रहता है, एक दूसरे को जनता है, समझता है तथा परिपक्व होता है। संचार को मानव सम्बन्धों की नींव कहा जा सकता है। समाज वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी भी परिवार, समूह, समुदाय तथा समाज में यदि मनुष्यों के बीच परस्पर वार्तालाप बन्द हो जाये तो सामाजिक विघटन की प्रक्रिया आरम्भ हो जायेगी एवं मानसिक विकृतियाँ जन्म लेने लगेंगी।

● विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई संचार की परिभाषाएँ
(Definitions of communication given by various scholars) :-

         ★ संचार एक शक्ति है जिसमें एक एकाको संप्रेषण दूसरे व्यक्तियो को व्यवहार बदलने हेतु प्रेरित करता है।
-हावलैंड
★ वाणी, लेखन या संकेतों के द्वारा विचारों अभिमतों अथवा सूचना का विनिमय करना संचार कहलाता है।
-रॉबर्ट एंडरसन
★ संचार एक पक्रिया है जिसमें सामाजिक व्यवस्था के द्वारा सूचना, निर्णय और निर्देश दिए जाते है और यह एक मार्ग है जिसमें ज्ञान, विचारों और दृष्टिकोणों को निर्मित अथवा परिवर्तित किया जाता है।
-लूमिक और बीगल
★ संचार समानूभूति की प्रक्रिया या श्रृंखला है जो कि एक संस्था के सदस्यों को उपर से नीचे तक और नीचे से उपर तक जोड़ती है।
-मैगीनसन
★ किसी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को अथवा किसी एक व्यक्ति से कई व्यक्तियों को कुछ सार्थक चिन्हों, संकेतों या प्रतीकों के सम्प्रेषण से सूचना, जानकारी, ज्ञान या मनोभाव का आदान-प्रदान करना संचार है।
-प्रो. रमेश जैन


संचार का महत्व ( Communication of the importance ) :-
                                                                                                                                                   संचार एक द्वि-मार्गीय प्रक्रिया है जहाँ पर विचारों का आदान-प्रदान होता है । बिना संचार के मानवीय संसाधनों को गतिमान किया जाना असंभव है । संचार को प्रेषित करने के अनेक माध्यम है । संचार को तभी सफल माना जा सकता है जब प्रेषित सन्देश को प्राप्तकर्ता अर्थनिरूपण कर उसकी प्रतिपुष्टि करें । मानवीय जीवन के विभिन्न पहलुओं में संचार का अत्याधिक महत्व है। प्रशासन में संचार के महत्व को स्वीकारते हुए एल्विन डाड लिखते है कि ‘‘संचार प्रबन्ध की मुख्य समस्या है ।’’ थियो हैमेन का कहना है कि ‘‘प्रबन्धकीय कार्यों की सफलता कुशल संचार पर निर्भर करती है।“ सुओजानिन के अनुसार’ अच्छा संचार प्रबन्ध के एकीकृत दृष्टिकोण हेतु बहुत महत्वपूर्ण है।“ संचार के महत्व को निम्न बिन्दुओं के सन्दर्भ में भली प्रकार समझा जा सकता है-
१-नियोजन एवं संचार ( Planning and communication ) :-
                                                                                              नियोजन एक अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्राथमिक कार्य है लक्ष्य की प्राप्ति कुशल नियोजन के प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। संचार योजना के निर्माण एवं उसके क्रियान्वयन दोनों के लिये अनिवार्य ह। कुशल नियोजन हेतु अनेक प्रकर की आवश्यक एवं उपयोगी सूचनाओं, तथ्यों एवं आँकड़ों और कुशल क्रियान्वयन हेतु आदेश, निर्देश एवं मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है ।
२-संगठन एवं संचार  ( Organization & communication ):-
                                                                                              अधिकार एवं दायित्वों का निर्धारण एवं प्रत्यायोजन करना और कर्मचारियों को उनसे अवगत कराना संगठन के क्षेत्र में आते है ये कार्य भी बिना संचार के असम्भव है। बर्नाड के शब्दों में “संचार की एक सुनिश्चित प्रणाली की आवश्यकता संगठनकर्ता का प्रथम कार्य है।’’
३-अभिप्रेरणा एवं संचार (Motivations and communication) :- 
                                                                                                    प्रबन्धकों द्वारा कर्मचारियों को अभिप्रेरित किया जाता है, जिसके लिए संचार की आवश्यकता पड़ती है। ड्रकर के शब्दों में “ सूचनायें प्रबन्ध का एक विशेष अस्त्र है प्रबन्धक व्यक्तियों को हॉकने का कार्य नहीं करता वरन वह उनको अभिप्रेरित, निर्देशित और संगठित करता है। ये सभी कार्य करने हेतु मौखिक अथव लिखित शब्द अथवा अंकों की भाषा ही उसका एकमात्र औजार होती है ।’’
४-समन्वय एवं संचार (Coordination & communication ) :– 
                                                                                                 समन्वय एक समूह द्वारा किये जाने वाले प्रयासों को एक निश्चित दिशा प्रदान करने हेतु आवश्यक होता है । न्यूमैन के अनुसार “ अच्छा संचार समन्यव में सहायक होता है।’’ कुशिग नाइलस लिखती है कि “समन्वय हेतु अच्छा संचार अनिवार्यता है।“ बर्नार्ड के शब्दों में ‘‘संचार वह साधन है जिसके द्वारा किसी संगठन में व्यक्तियों को एक समान-उद्देश्य की प्राप्ति हेतु परस्पर संयोजित किया जा सकता है।“
५-नियन्त्रण एंव संचार  ( Control and communication) ;-
                                                                                             नियन्त्रण द्वारा कुशल प्रबंधन यह जानने प्रयास करता है कि कार्य पूर्व निश्चित योजनानुसार हो रहा है अथवा नही ? इसके अतिरिक्त वह त्रुटियों एवं विचलनों को ज्ञात कर यथाशीध्र ठीक करने और उनकी पुनरावृत्ति को रोकने का प्रयास करता है । ये सभी कार्य बिना कुशल संचार प्रणाली के सम्भव नहीं होता है ।
६-निर्णयन एवं संचार ( Decision making and communication ):-   
              सही निर्णयन लेने हेतु प्रबंन्धकों को सही समय पर सही एवं पर्याप्त सूचनाओं, तथ्यों एवं आंकड़ों का ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य होता है । यह कार्य भी बिना प्रभावी संचार प्रणाली के सम्भव नही होता है ।
७-प्रभावशीलता  ( Effectiveness ) :-   
            प्रभावी सेवाएं उपलबध करने के लिये जरूरी है कि स्टाफ के सदस्यों के बीच विचारों एवं मुक्त अदान-प्रदान बना रहे है । किसी संगठन की प्रभावशीलता इसी बात पर निर्भर होती है कि वहां के कर्मचारी आपस में विचारों को कितना आदान-प्रदान करते है और वे एक दूसरे की बात कितनी समझते हैं
८-न्यूनतम व्यय पर अधिकतम उत्पादन ( The minimum expenditure on the maximum output ) :-
                समस्त विवेकशील प्रबंधकों का लक्ष्य अधिकतम, श्रेष्ठतम् व सस्ता उत्पादन करना होता है। उत्पादकता बढा़ने के लिये आवश्यक है कि संगठन में मतभेद न हो, परस्पर सद्भाव हो , जिसमें संचार’ बहुत सहायक सिद्ध हुआ है ।

संचार में चरण ( In the communication phase) :-
         संचार प्रक्रिया में चरणों को चार मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है:-
A. प्रथम चरण ( First phase )  :- प्रेषक संदेश को कूटसंकेत करता है एवं भेजने के लिये उपयुक्त माध्यम का चयन करता है । प्रेषत किये जाने सन्देश का प्रेषक मौखिक, अमौखिक किसअथवा लिखित रूप में उचित माध्यम से भेजना है
B. द्वितीय चरण  ( Second phase ) :- प्रेषक दूसरे चरण में सन्देश को भेजता है तथा यह प्रयास करता है कि सन्देश प्रेषित करते समय किसी भी प्रकार का व्यवधान न उत्पन्न हो तथा प्राप्तकर्ता बिना किसी व्यवधान के संदेश को समझ सकें ।
C. तृतीय चरण ( Third phase ) :- प्राप्तकर्ता प्राप्त सन्देष का अर्थ निरूपण करता है तथा आवश्यकता के अनुसार उसकी प्रतिपुष्टि करने का प्रयास करता है ।
D. चर्तुथ चरण (Fourth phase ) : - प्रतिपुष्टि चरण में प्राप्तकर्ता प्राप्त सन्देश का अर्थनिरूपण करने के पश्चात् प्रेषक के पास प्रतिपुष्टि करता है ।

संचार के ढंग ( Communication of manner )  :-

वर्तमान समय में संचार की अनेक ढंगों का उपयोग किया जा रहा है जो कि निम्नवत् है-
    1. ज्ञापन (Memo) :- ज्ञापन विधि का प्रयोग अधिकतर आन्तरिक संचार के लिये किया जाता है जहाँ पर सदस्यों तथा सदस्यों से सम्बन्धित फर्म के मध्य संक्षिप्त रूप में सूचना का अदान-प्रदान होता है।
    2. पत्र (Letter) :- वाहय संचार के अधिकतर पत्रों के माध्यमों से सूचना अथवा सन्देश का आदान-प्रदान किया जाता है । यथा-आदेश, व्यापार से सम्बन्धित अभिलेख इत्यादि।
    3. फैक्स (Fax):- फैक्स भी संचार की विधि है जिसके द्वारा त्वरित संन्देश प्राप्तकर्ता तक पहुँचता है ।
    4. र्इ-मेल (E- mail):- सूचनाओं को हस्तांतरित करके के लिये र्इ-मेल के द्वारा त्वरित एवं सुविधाजनक रूप में सन्देश को प्रेषित किया जाता है ।
    5. सूचना (Information) :- सूचना भी संचार की एक प्रविधि है । उदाहरण के लिये किसी संगठन में कर्मचारियों को उनसे सम्बन्धित रोजगार, सुरक्षा, स्वास्थ्य, नियम, कानून तथा कल्याणकारी सुविधायें सूचनाओं द्वारा प्रदान की जाती है ।
    6. सारांश ( Summary) :- सारांश प्रविधिका प्रयोग संचार के लिये अधिकतर मीटिंग में किया गया जाता है।
    7. प्रतिवेदन (Report) :- प्रतिवेदन भी संचार की एक प्रविधि है यथा वित्तीय प्रतिवेदन, समितियों की सिफारिशें, प्रौधोगिकी प्रतिवेदन इत्यादि ।
    8. दूरभाष  (Tel) :- मौखिक संचार के लिये दूरभाष का प्रयोग किया जाता है । दूरभाष प्रविधि का प्रयोग वहाँ पर अधिक किया जाता है जहाँ पर आमने-सामने सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाता है ।
    9. साक्षात्कार ( Interview) :- साक्षात्कार प्रविधि का प्रयोग कर्मचारियों के चयन उनकी प्रोन्नति तथा व्यक्तिगत विचार विमर्श के लिये किया जाता है ।
   10. रेडियो (Radio) :- एक निश्चित आवृत्ति पर रेडियो के द्वारा संचार को प्रेषित किया जाता है ।
   11. टी0वी0 (T.V.) :- टी0वी0 का भी प्रयोग संचार के लिये किया जाता है । जिसे एक उचित नेटवर्क के द्वारा देखा व सुना जाता है ।
   12. वीडियों कान्फ्रेन्सिंग  (Video conference) :- वर्तमान समय में वीडियो कान्फ्रेन्सिंग एक महत्वपूर्ण विधि है । जिसमें फोन के तार के द्वारा वीडियों के साथ आवाज को सुना जा सकता है । इसके अतिरिक्त योजना, चित्र, नक्शा, चार्ट, ग्राफ आदि ऐसे ढंग है जिससे संचार को प्रेषित किया जाता है ।






संचार में कारक (In the communication factor) -
                                                                                                                              संचार में कारकों को मुख्य दो भागों में विभाजित किया जा सकता है । एक वे कारक जो संचार को प्रभावी बनाने में सहायक होते है। दूसरे जैसे कारक जो कि संचार व्यवस्था में नकारात्मक भूमिका निभाते है। संचार को प्रोत्साहित करने वाले कारक निम्न है :-
१- विषय का ज्ञान ( knowledge of the subject) : - संचारक को संचारित किये जाने वाले विषय की पूरी जानकारी होनी आवश्यक है। विषय के गहन अध्ययन के अभाव में संचार सफल नहीं हो सकता है।
२- संचार कौशल (Communication skills) : - संचार प्रक्रिया के दो महत्वपूर्ण पहलू है संकेतीकरण एवं संकेत को समझना। संकेतीकरण के अन्तर्गत लेखन एवं वाक्शक्ति आते है तथा संकेत के अर्थनिरूपण में पठन एवं श्रवण जैसी विधाए शामिल है । इसके अतिरिक्त सोचना तथा तर्क करना सफल संचार के लिये आवश्यक है ।
३- संचार माध्यमों का ज्ञान  ( Communication mediums of knowledge ) : - संचार कार्य विन्नि माध्यमों से सम्पन्न होता है । संचार माध्यमों की प्रकृति, प्रयोज्यता एवं उपयोग की विधि के विषय में संचारक को ज्ञान होना चाहिए ।
४- रूचि ( Well ) : - किसी भी कार्य के सफल क्रियान्वयन के लिये आवश्यक है कि कार्यकर्ता अपने कार्य में रूचि ले तथा पूरी तन्मयता के साथ उसका निर्वाह करें । रूचिपूर्वक कार्य सम्पादित करके संचारक न केवल अपनी उन्नति के द्वार खोलना है बल्कि दूसरों की प्रगति का मार्गदर्शक भी बनता है ।
५- अभिवृत्ति ( Aptitude ) : - हर व्यक्ति की अपने कार्य, स्थल तथा सहकर्मियों के प्रति कुछ अभिवृत्तियाँ होती है । ये अभिवृत्तियाँ व्यक्ति की कार्य-सम्पादन शैली को प्रभावित करती है । यदि संचारक अपने कार्य, कार्य-स्थल, सहकर्मियों तथा संचार ग्रहणकर्ता के प्रति आस्थावान हो और सामान्य सौहार्दपूर्ण अभिवृत्ति रखता हो तो वह निश्चित रूप में अपने कार्य में सफल होगा ।
६- विश्वसनीयता  ( Reliability ) : - विश्वसनीयता संचारक का अति महत्वपूर्ण गुण है । संचारक के प्रति विश्वसनीयता सन्देश ग्राºयता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । संचारक के प्रति ग्रहणकर्ताओं में जितना ही अटूट विश्वास होगा, ग्रहणकर्ता उतनी ही तत्परता, तन्मयता तथा सम्पूर्णता के साथ सन्देश को ग्रहण करेगें ।
७- अच्छा व्यवहार ( Good behavior ) : - संचारक की भूमिका एक मार्ग-दर्शक की होती है । ग्रहणकर्ता के साथ उसका अच्छा व्यवहार सफल संचार-सम्बन्ध को स्थापित कर सकता है। संदेश स्पष्ट एवं सरल होने चाहिये । संचार व्यवस्था में नकारात्मक भूमिका को निभाने वाले कारक निम्न है :-
•  उपयुक्त एवं उचित संचार प्रक्रिया का आभाव
•  वैधानिक सीमायें एवं अनुपयुक्त संचार नीति
•  अनुपयुक्त वातावरण
•  उचित रणनीति का आभाव
•  सरल एवं स्पष्ट भाषा का आभाव
•   प्रेरणा का आभाव 
• संचार कुशलता का आभाव ।

संचार-प्रक्रिया एवं तत्व
 ( Communication-process and elements ) :-
                                                                                                                       संचार एक द्विमार्गीय प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक लोगों के बीच विचारों, अनुभवों, तथ्यों तथा प्रभावों का प्रेषण होता है । संचार प्रक्रिया में प्रथम व्यक्ति संदेश स्रोत (Source) या प्रेषक (Sender) होता है । दूसरा व्यक्ति संदेश को ग्रहण करने वाला अर्थात प्राप्तकर्ता या ग्रहणकर्ता होता है । इन दो व्यक्तियों के मध्य संवाद या संदेश होता है जिसे प्रेषित एवं ग्रहण किया जाता है प्रेषित किये शब्दों से तात्पर्य ‘अर्थ’ से होता है तथा ग्रहणकर्ता शब्दों के पीछे छिपे ‘अर्थ’ को समझने के पश्चात् प्रतिक्रियों व्यक्त करता है। सामान्यत: संचार की प्रक्रिया तीन तत्वों क्रमश: प्रेषक (Sender) सन्देश (Message) तथा प्राप्तकर्ता (Reciver) के माध्यम से सम्पन्न होती है। किन्तु इसके अतिरिक्त सन्देश प्रेषक को किसी माध्यम की भी आवश्यकता होती है जिसकी सहायता से वह अपने विचारों को प्राप्तिकर्ता तक पहुंचाता है।
            अत: कहा जा सकता है कि संचार प्रक्रिया में अर्थों का स्थानान्तरण होता है । जिसे अन्त: मानव संचार व्यवस्था भी कह सकते है।

संचार नेटवर्क (Communicaetion network) :-
                                                                                                                संचार नेटवर्क से तात्पर्य किसी समूह के सदस्यों के बीच विभिन्न पैटर्न से होती है । संचार नेटवक्र का अध्ययन लिमिट्ट, तथा शॉ द्वारा किया गया है । लिमिट्ट तथा शॉ द्वारा किये अध्ययन के आधार पर पाँच तरह के संचार नेटवर्क को पहचान की गयी है । संचार नेट वर्क इस प्रकार है -

1चक्र नेटवर्क (Wheel Network)- इस तरह के नेटवर्क में समूह में एक व्यक्ति ऐसा होता है जिसकी स्थिति अधिक केन्द्रित होती है । उसे लोग समूह के नेता के रूप में प्रत्यक्षण करते है ।

2- श्रंखला नेटवर्क (Chain Network)- श्रंखला नेटवर्क में समूह का प्रत्येक सदस्य अपने निकटमत सदस्य के साथ ही कुछ संचार कर सकता हे । इस तरह के नेटवर्क में सूचना ऊपरी तथा निचली किसी भी दिशा में प्रवाहित हो सकती है।

3वृत्त नेटवर्क (Circle Network)- इस तरह के नेटवर्क में समूह का कोर्इ सदस्य केन्द्रित स्थिति में नहीं होता तथा संचार सभी दशाओं में प्रवाहित होता है।

4वार्इ नेटवर्क (Y Network)- वार्इ नेटवर्क एक केन्द्रित नेटवर्क होता है जिसमें व्यक्ति ऐसा होता है जो अन्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होता है।

5कमकन नेटवर्क (Comcon Network) - कमकन नेटवर्क एक तरह का खुला संचार होता है जसमें समूह का प्रत्येक सदस्य दूसरे सदस्य से सीधे संचार स्थापित कर सकता है ।


प्रभावी संचार की विशेषतायें
( Effective communication features) :-
 प्रभावी संचार की विशेषतायें निम्नवत् है -
१- संचार का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए ।
२- संचार की भाषा बोधगम्य, सरल व आसानी से समझ में आने वाली होनी चाहिये ।
३- संचार यथा सम्भव स्पष्ट एवं सभी आवश्यक बातों से युक्त होना चाहिए ।
४- संचार प्राप्तकर्ता की प्रत्याशा के अनुरूप होने चाहिए ।
५- संचार यथासमय अर्थात् सही समय पर होना चाहिये ।
६- संचार पे्रषित करने के पूर्व सम्बन्धित विषय में पूर्ण जानकारी का ज्ञान होना आवश्यक है ।
७- संचार करने से पूर्व परस्पर विश्वास स्थापित करना आवश्यक है ।
८- संचाार में लोचशीलता होनी चाहिये अर्थात् आवश्यकतानुसार उसमें परिवर्तन किया जा सके ।
९- संचार को प्रभावी बनाने के लिये उदाहरणों तथा श्रव्य दृश्य साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिए ।
१०- विलम्बकारी प्रवृत्तियों अथवा प्रतिक्रियाओं को व्यवहार में नहीं लाना चाहिए । संचार सन्देशों की एक निरन्तर श्रंखला होनी चाहिये ।
११- एक मार्गीगीय संचार की अपेक्षा द्विमार्गीय संचार श्रेष्ठ होता है ।
१२- सन्देश प्रेषित करते समय ऐसा प्रयास किया जाना चाहिये कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक विश्वासों पर किसी प्रकार का कुठाराघात न हो ।
१३- संचार हमेशा लाभप्रद होना चाहिये क्योकि मनुष्य का स्वभाव है कि किसी भी बात में लाभप्रद सम्भावनाओं को देखता है ।
१४- संचार में प्रयोग की जाने वाली विधियाँ या कार्य खर्चीले नही होने चाहिये अर्थात मितव्यियता के सिद्धान्त का पालन करना चाहिए ।
१५- संचार में विभाज्यता का गुण होना चाहिये क्योंकि प्रेषित सन्देश का उद्देश्य पूरे समुदाय या वर्ग के कल्याण में निहित होता है ।
१६- संचार बहुहितकारी होना चाहिये अर्थात बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की भावना होनी चाहिये ।

संचार का इतिहास
 ( Communication history) :-                               
                                                                          संचार का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ होता है। संचार के अन्तर्गत तुच्छ विचार-विनिमय से लेकर शास्त्रार्थ एवं जनसंचार (mass communication) सब आते हैं। कोई २००,००० वर्ष पूर्व मानव-वाणी के प्रादुर्भाव के साथ मानव संचार में एक क्रान्ति आयी थी। लगभग ३०,००० वर्ष पूर्व प्रतीकों का विकास हुआ एवं लगभग ७००० ईसापूर्व लिपि और लेखन का विकास हुआ। इनकी तुलना में पिछली कुछ शताब्दियों में ही दूरसंचार के क्षेत्र में बहुत अधिक विकास हुआ है।


  प्रमुख घटनाएँ  ( Major events ):-
1- चित्रलिपि का विकास।
2- वर्ण आधारित लिपि का विकास।
3- कागज का आविष्कार।
4- घूर्णी प्रिंटिंग का विकास।
5- यूरोप में समाचार पत्रों का प्रकाशन।
6- फोटोग्राफी का विकास।
7- चलचित्र (सिनेमा) का आविष्कार।
8- विद्युत टेलीग्राफ।
9- दूरभाष।
10- रेडियो - सन् १८८८ में हर्ट्ज ने रेडियो तरंगों पर प्रयोग किये।
11- दूरदर्शन - सन् १९२३ में बेयर्ड ने टेलीविजन सिस्टम का पेटेंट लिया।
12- अन्तरजाल का विकास ।
13- मोबाइल फोन का विकास ।

बुधवार, 21 मार्च 2018

खण्ड-5 पत्रकारिता का इतिहास






पत्रकारिता का इतिहास :-
( Journalism history )

    पत्रकारिता का इतिहास, प्रौद्योगिकी और व्यापार के विकास के साथ आरम्भ हुआ।

इतिहास ( History ) :-
                  लगता है कि विश्व में पत्रकारिता का आरंभ सन 131 ईस्वी पूर्व रोम में हुआ था। उस साल पहला दैनिक समाचार-पत्र निकलने लगा। उस का नाम था – “Acta Diurna (दिन की घटनाएं)। वास्तव में यह पत्थर की या धातु की पट्टी होता था जिस पर समाचार अंकित होते थे। ये पट्टियां रोम के मुख्य स्थानों पर रखी जाती थीं और इन में वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, नागरिकों की सभाओं के निर्णयों और ग्लेडिएटरों की लड़ाइयों के परिणामों के बारे में सूचनाएं मिलती थीं।
                 मध्यकाल में यूरोप के व्यापारिक केंद्रों में ‘सूचना-पत्र ‘ निकलने लगे। उन में कारोबार, क्रय-विक्रय और मुद्रा के मूल्य में उतार-चढ़ाव के समाचार लिखे जाते थे। लेकिन ये सारे ‘सूचना-पत्र ‘ हाथ से ही लिखे जाते थे।
                 15वीं शताब्दी के मध्य में योहन गूटनबर्ग ने छापने की मशीन का आविष्कार किया। असल में उन्होंने धातु के अक्षरों का आविष्कार किया। इस के फलस्वरूप किताबों का ही नहीं, अख़बारों का भी प्रकाशन संभव हो गया।   
                 16वीं शताब्दी के अंत में, यूरोप के शहर स्त्रास्बुर्ग में, योहन कारोलूस नाम का कारोबारी धनवान ग्राहकों के लिये सूचना-पत्र लिखवा कर प्रकाशित करता था। लेकिन हाथ से बहुत सी प्रतियों की नकल करने का काम महंगा भी था और धीमा भी। तब वह छापे की मशीन ख़रीद कर 1605 में समाचार-पत्र छापने लगा। समाचार-पत्र का नाम था ‘रिलेशन’। यह विश्व का प्रथम मुद्रित समाचार-पत्र माना जाता है।


भारत में पत्रकारिता का आरम्भ :-
     छापे की पहली मशीन भारत में 1674 में पहुंचायी गयी थी।मगर भारत का पहला अख़बार इस के 100 साल बाद, 1776 में प्रकाशित हुआ। इस का प्रकाशक ईस्ट इंडिया कंपनी का भूतपूर्व अधिकारी विलेम बॉल्ट्स  था। यह अख़बार स्वभावतः अंग्रेज़ी भाषा में निकलता था तथा कंपनी व सरकार के समाचार फैलाता था।
              सब से पहला अख़बार, जिस में विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त किये गये, वह 1780 में जेम्स ओगस्टस हीकी का अख़बार ‘बंगाल गज़ेट’ था। अख़बार में दो पन्ने थे और इस में ईस्ट इंडिया कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों की व्यक्तिगत जीवन पर लेख छपते थे। जब हीकी ने अपने अख़बार में गवर्नर की पत्नी का आक्षेप किया तो उसे 4 महीने के लिये जेल भेजा गया और 500 रुपये का जुरमाना लगा दिया गया। लेकिन हीकी शासकों की आलोचना करने से पर्हेज़ नहीं किया। और जब उस ने गवर्नर और सर्वोच्च न्यायाधीश की आलोचना की तो उस पर 5000 रुपये का जुरमाना लगाया गया और एक साल के लिये जेल में डाला गया। इस तरह उस का अख़बार भी बंद हो गया।

■ 1790 के बाद भारत में अंग्रेज़ी भाषा की और कुछ अख़बार स्थापित हुए जो अधिक्तर शासन के मुखपत्र थे। पर भारत में प्रकाशित होनेवाले समाचार-पत्र थोड़े-थोड़े दिनों तक ही जीवित रह सके।
■ 1819 में भारतीय भाषा में पहला समाचार-पत्र प्रकाशित हुआ था। वह बंगाली भाषा का पत्र – ‘संवाद कौमुदी’ (बुद्धि का चांद) था। उस के प्रकाशक राजा राममोहन राय थे।
■ 1822 में गुजराती भाषा का साप्ताहिक ‘मुंबईना समाचार’ प्रकाशित होने लगा, जो दस वर्ष बाद दैनिक हो गया और गुजराती के प्रमुख दैनिक के रूप में आज तक विद्यमान है। भारतीय भाषा का यह सब से पुराना समाचार-पत्र है।
■ 1826 में ‘उदंत मार्तंड’ नाम से हिंदी के प्रथम समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह साप्ताहिक पत्र 1827 तक चला और पैसे की कमी के कारण बंद हो गया।
■ 1830 में राममोहन राय ने बड़ा हिंदी साप्ताहिक ‘बंगदूत’का प्रकाशन शुरू किया। वैसे यह बहुभाषीय पत्र था, जो अंग्रेज़ी, बंगला, हिंदी और फारसी में निकलता था। यह कोलकाता से निकलता था जो अहिंदी क्षेत्र था। इस से पता चलता है कि राममोहन राय हिंदी को कितना महत्व देते थे।
■ 1833 में भारत में 20 समाचार-पत्र थे, 1850 में 28 हो गए और 1953 में 35 हो गये। इस तरह अख़बारों की संख्या तो बढ़ी, पर नाममात्र को ही बढ़ी। बहुत से पत्र जल्द ही बंद हो गये। उन की जगह नये निकले। प्रायः समाचार-पत्र कई महीनों से ले कर दो-तीन साल तक जीवित रहे।
            उस समय भारतीय समाचार-पत्रों की समस्याएं समान थीं। वे नया ज्ञान अपने पाठकों को देना चाहते थे और उसके साथ समाज-सुधार की भावना भी थी। सामाजिक सुधारों को लेकर नये और पुराने विचारवालों में अंतर भी होते थे। इस के कारण नये-नये पत्र निकले। उन के सामने यह समस्या भी थी कि अपने पाठकों को किस भाषा में समाचार और विचार दें। समस्या थी – भाषा शुद्ध हो या सब के लिये सुलभ हो? 1846 में राजा शिव प्रसाद ने हिंदी पत्र ‘बनारस अख़बार’ का प्रकाशन शुरू किया। राजा शिव प्रसाद शुद्ध हिंदी का प्रचार करते थे और अपने पत्र के पृष्ठों पर उन लोगों की कड़ी आलोचना की जो बोल-चाल की हिंदुस्तानी के पक्ष में थे। लेकिन उसी समय के हिंदी लखक भारतेंदु हरिशचंद्र ने ऐसी रचनाएं रचीं जिन की भाषा समृद्ध भी थी और सरल भी। इस तरह उन्होंने आधुनिक हिंदी की नींव रखी है और हिंदी के भविष्य के बारे में हो रहे विवाद को समाप्त कर दिया। 1868 में भरतेंदु हरिशचंद्र ने साहित्यिक पत्रिका ‘कविवच सुधा’ निकालना प्रारंभ किया। 1854 में हिंदी का पहला दैनिक ‘समाचार सुधा वर्षण’ निकला।


मंगलवार, 20 मार्च 2018

खण्ड-2 पत्रकारिता - परिभाषाएँ एवं प्रकार

पत्रकारिता (Journalism) :-

         पत्रकारिता (अंग्रेजी : journalism) आधुनिक सभ्यता का एक प्रमुख व्यवसाय है जिसमें समाचारों का एकत्रीकरण, लिखना, जानकारी एकत्रित करके पहुँचाना, सम्पादित करना और सम्यक प्रस्तुतीकरण आदि सम्मिलित हैं। आज के युग में पत्रकारिता के भी अनेक माध्यम हो गये हैं; जैसे - अखबार, पत्रिकायें, रेडियो, दूरदर्शन, वेब-पत्रकारिता आदि।

परिभाषा (Definition) :-
          पत्रकारिता शब्द अंग्रेज़ी के "जर्नलिज़्म"(Journalism) का हिंदी रूपांतर है। शब्दार्थ की दृष्टि से "जर्नलिज्म" शब्द 'जर्नल' से निर्मित है और इसका आशय है 'दैनिक'। अर्थात जिसमें दैनिक कार्यों व सरकारी बैठकों का विवरण हो। आज जर्णल शब्द 'मैगजीन' का धोतक हो चला है । यानी, दैनिक, दैनिक समाचार-पत्र या दूसरे प्रकाशन, कोई सर्वाधिक प्रकाशन जिसमें किसी विशिष्ट क्षेत्र के समाचार हो। ( डॉ॰ हरिमोहन एवं हरिशंकर जोशी- खोजी पत्रकारिता, तक्षशिला प्रकाशन )
         पत्रकारिता लोकतंत्र का अविभाज्य अंग है। प्रतिपाल परिवर्तित होनेवाले जीवन और जगत का दर्शन पत्रकारिता द्वारा ही संभंव है। परिस्थितियों के अध्ययन, चिंतन-मनन और आत्माभिव्यक्ति की प्रवृत्ति और दूसरों का कल्याण अर्थात् लोकमंगल की भावना ने ही पत्रकारिता को जन्म दिया।

“सी. जी. मूलर” ने बिल्कुल सही कहा है कि-
        "सामायिक ज्ञान का व्यवसाय ही पत्रकारिता है। इसमें तथ्यों की प्राप्ति उनका मूल्यांकन एवं ठीक-ठाक प्रस्तुतीकरण होता है।"
( Journilism is business of timely knowledge the business of obtaining the necessary facts, of evaluating them carefully and of presenting them fully and of acting on them wisely.)

“डॉ॰ अर्जुन तिवारी” के कथानानुसार-
              "ज्ञान और विचारों को समीक्षात्मक टिप्पणियों के साथ शब्द, ध्वनि तथा चित्रों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाना ही पत्रकारिता है। यह वह विद्या है जिसमें सभी प्रकार के पत्रकारों के कार्यो, कर्तव्यों और लक्ष्यों का विवेचन होता है। पत्रकारिता समय के साथ समाज की दिग्दर्शिका और नियामिका है। "                                                   

पत्रकारिता का स्वरूप और विशेषतायें :-
(Journalistic format and features)  
       सामाजिक सरोकारों तथा सार्वजनिक हित से जुड़कर ही पत्रकारिता सार्थक बनती है। सामाजिक सरोकारों को व्यवस्था की दहलीज तक पहुँचाने और प्रशासन की जनहितकारी नीतियों तथा योजनाओं को समाज के सबसे निचले तबके तक ले जाने के दायित्व का निर्वाह ही सार्थक पत्रकारिता है।
               पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा पाया (स्तम्भ) भी कहा जाता है। पत्रकारिता ने लोकतंत्र में यह महत्त्वपूर्ण स्थान अपने आप नहीं हासिल किया है बल्कि सामाजिक सरोकारों के प्रति पत्रकारिता के दायित्वों के महत्त्व को देखते हुए समाज ने ही दर्जा दिया है। कोई भी लोकतंत्र तभी सशक्त है जब पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी सार्थक भूमिका निभाती रहे। सार्थक पत्रकारिता का उद्देश्य ही यह होना चाहिए कि वह प्रशासन और समाज के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी की भूमिका अपनाये।
                पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डाले तो स्वतंत्रता के पूर्व पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता प्राप्ति का लक्ष्य था। स्वतंत्रता के लिए चले आंदोलन और स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता ने अहम और सार्थक भूमिका निभाई। उस दौर में पत्रकारिता ने पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने के साथ-साथ पूरे समाज को स्वाधीनता की प्राप्ति के लक्ष्य से जोड़े रखा।
                 इंटरनेट और सूचना के आधिकार (आर.टी.आई.) ने आज की पत्रकारिता को बहुआयामी और अनंत बना दिया है। आज कोई भी जानकारी पलक झपकते उपलब्ध की और कराई जा सकती है। मीडिया आज काभी सशक्त, स्वतंत्र और प्रभावकारी हो गया है। पत्रकारिता की पहुँच और आभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का व्यापक इस्तेमाल आमतौर पर सामाजिक सरोकारों और भलाई से ही जुड़ा है, किंतु कभी कभार इसका दुरपयोग भी होने लगा है।
                 संचार क्रांति तथा सूचना के आधिकार के अलावा आर्थिक उदारीकरण ने पत्रकारिता के चेहरे को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। विज्ञापनों से होनेवाली अथाह कमाई ने पत्रकारिता को काफी हद्द तक व्यावसायिक बना दिया है। मीडिया का लक्ष्य आज आधिक से आधिक कमाई का हो चला है। मीडिया के इसी व्यावसायिक दृष्टिकोन का नतीजा है कि उसका ध्यान सामाजिक सरोकारों से कहीं भटक गया है। मुद्दों पर आधारित पत्रकारिता के बजाय आज इन्फोटेमेंट ही मीडिया की सुर्खियों में रहता है। 
                इंटरनेट की व्यापकता और उस तक सार्वजनिक पहुँच के कारण उसका दुष्प्रयोग भी होने लगा है। इंटरनेट के उपयोगकर्ता निजी भड़ास निकालने और अतंर्गततथा आपत्तिजनक प्रलाप करने के लिए इस उपयोगी साधन का गलत इस्तेमाल करने लगे हैं। यही कारण है कि यदा-कदा मीडिया के इन बहुपयोगी साधनों पर अंकुश लगाने की बहस भी छिड़ जाती है। गनीमत है कि यह बहस सुझावों और शिकायतों तक ही सीमित रहती है। उस पर अमल की नौबत नहीं आने पाती। लोकतंत्र के हित में यही है कि जहाँ तक हो सके पत्रकारिता हो स्वतंत्र और निर्बाध रहने दिया जाए, और पत्रकारिता का अपना हित इसमें है कि वह आभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग समाज और सामाजिक सरोकारोंके प्रति अपने दायित्वों के ईमानदार निवर्हन के लिए करती रहे।

पत्रकारिता के प्रमुख प्रकार :-
( Journalism major types )

1-खोजी पत्रकारिता :-
(  Investigative journalism )
        मनुष्य स्वभाव से ही जिज्ञासु होता है। उसे वह सब जानना अच्छा लगता है जो सार्वजनिक नहीं हो अथवा जिसे छिपाने की कोशिश की जा रही हो। मनुष्य यदि पत्रकार हो तो उसकी यही कोशिश रहती है कि वह ऐसी गूढ़ बातें या सच उजागर करे जो रहस्य की गहराइयों में कैद हो। सच की तह तक जाकर उसे सतह पर लाने या उजागर करने को ही हम अन्वेषी या खोजी पत्रकारिता कहते हैं।
                 खोजी पत्रकारिता एक तरह से जासूसी का ही दूसरा रूप है जिसमें जोखिम भी बहुत है। यह सामान्य पत्रकारिता से कई मायनों में अलग और आधिक श्रमसाध्य है। इसमें एक-एक तथ्य और कड़ियों को एक दूसरे से जोड़ना होता है तब कहीं जाकर वांछित लक्ष्य की प्राप्ति होती है। कई बार तो पत्रकारों द्वारा की गई कड़ी मेहनत और खोज को बीच में ही छोड़ देना पड़ता है, क्योंकि आगे के रास्ते बंद हो चुके होते हैं। पत्रकारिता से जुड़ी पुरानी घटनाआें पर नजर दौड़ायें तो माई लाई कोड, वाटरगेट कांड, जैक एंडर्सन का पेंटागन पेपर्स जैसे आंतरराष्ट्रीय कांड तथा सीमेंट घोटाला कांड, बोफोर्स कांड, ताबूत घोटाला कांड तथा जैसे राष्ट्रीय घोटाले खोजी पत्रकारिता के चर्चित उदाहरण हैं। ये घटनायें खोजी पत्रकारिता के उस दौर की हैं जब संचार क्रांति, इंटरनेट या सूचना का आधिकार (आर.टी.आई) जैसे प्रभावशाली अस्त्र पत्रकारों के पास नहीं थे। इन प्रभावशाली हथियारों के आस्तित्व में आने के बाद तो घोटाले उजागर होने का जैसे एक दौर ही शुर हो गया हाल के कुछ चर्चित घोटालों में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, आदर्श घोटाला, ताज कारीडोर घोटाला आदि उल्लेखनीय हैं। जाने-माने पत्रकार जुलियन असांज के ‘विकीलिक्स’ ने तो ऐसे-ऐसे रहस्योद्घाटन किये जिनसे कई देशों की सरकारें तक हिल गई।                                   
        इंटरनेट और सूचना के आधिकार ने पत्रकारों और पत्रकारिता की धार को अत्यंत पैना बना दिया लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि पत्रकारिता की आड़ में इन हथियारों का इस्तेमाल ’ब्लैकमेलिंग' जैसे गलत उद्देश्य के लिए भी होने लगा है। समय-समय पर हुये कुछ ’स्टिंग ऑपरेशन' और कई बहुचर्चित सी. डी. कांड इसके उदाहरण हैं।
                स्टिंग पत्रकारिता के संदर्भ में फोटो जर्नलिज्म या फोटो पत्रकारिता से जुड़े जासूसों जिन्हें 'पापारात्सी' (Paparazzi) कहते हैं, की चर्चा भी जररी है। प्रिंसेस डायना की मौत के जिम्मेदार ’पैदराजा' ही थे। समाज की बेहतरी और उसकी भलाई के लिए खोजी पत्रकारिता का एक आवश्यक अंग जरर है, लेकिन इसे भी अपनी मर्यादाओं के घेरे में रहना चाहिए। खोजी पत्रकारिता साहसिक तक तो ठीक है, लेकिन इसका दुस्साहस न तो पत्रकारिता के हित में है और न ही समाज के।

2- खेल पत्रकारिता :-
( Game journalism )
           खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि वह अच्छे स्वास्थ्य, शारीरिक दमखम और बौद्धिक क्षमता का भी प्रतीक है। यही कारण है किं पूरी दुनिया में आति प्राचीनकाल से खेलों का प्रचलन रहा है। मल्ल-युद्ध, तीरंदाजी, घुड़सवारी, तैराकी, गुल्ली डंडा, पोलो रस्साकशी, मलखंभ, वॉल गेम्स, जैसे आउटडोर या मैदानी खेलों के अलावा चौपड़, चौसर या शतरंज जैसे इन्डोर खेल प्राचीनकाल से ही लोकप्रिय रहे हैं। आधुनिक काल में इन पुराने खेलों के अलावा इनसे मिलते जुलते खेलों तथा अन्य आधुनिक स्पर्धात्मक खेलों ने पूरी दुनिया में अपना वर्चस्व कायम कर रखा है। खेल आधुनिक हों या प्राचीन, खेलों में होनेवाले अद्भुत कारनामों को जगजाहिर करने तथा उसका व्यापक प्रचार-प्रसार करने में खेल पत्रकारिता का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। आज पूरी दुनिया में खेल यदि लोकप्रियता के शिखर पर हैं तो उसका काफी कुछ श्रेय खेल पत्रकारिता को भी है।
                    आज स्थिति यह है कि समाचार पत्रों या पत्रिकाओ के अलावा किसी भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्करप तब तक परिपूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसमें खेलों का भरपूर कवरेज नहीं हो। खेलों के प्रति मीडिया का यह रुझान ’डिमांड' और ’सप्लाई' पर आधारित है। आज भारत ही नहीं पूरी दुनिया में आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवा वर्ग का है जिसकी पहली पसंद विभिन्न खेल स्पर्धायें हैं, शायद यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओ में अगर सबसे आधिक कोई पन्ने पढ़ जाते हैं तो वह खेल से संबंधित होते है। प्रिंट मीडिया के अलावा टी. वी. चैनलों का भी एक बड़ा हिस्सा खेलों प्रसारण से जुड़ा होता है। खेल चैनल तो चौबीसों घंटे कोई न कोई खेल लेकर हाजिर ही रहते हैं। लाइव कवरेज या सीधा प्रसारण की बात तो छोड़िये रिकॉर्डेड पुराने मैचों के प्रति भी दर्शकों का रझान कहीं कम नहीं दिखाई देता। पाठकों और दर्शकों की खेलों के प्रति दीवनगी का ही नतीजा है कि आज खेल की दुनिया में अकूत धन बरस रहा है। धन, जो विज्ञापन के रप में हो चाहे पुरस्कार राशि के रप में न  लुटानेवालों की कमी है न पानेवालों की। यह स्थिति आज की है। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब खेलों में धनदौलत को कोई नामोनिशान नहीं था। प्राचीन ओलिम्पिक खेलों जैसी विख्यात खेल स्पर्धा में भी विजेता को जैतून की पत्तियों के मुकुट का पुरस्कार दिया जाता था लेकिन वह ताज भी अनमोल हुआ करता था।
        खेलों में धन-वर्षा का प्रारंभ कार्पोरेट जगत के इसमें प्रवेश से हुआ। कार्पोरेट जगत के प्रोत्साहन से कई खेल और खिलाड़ी प्रोफेशनल होने-लगे और खेल-स्पर्धाओ से लाखों करोड़ो कमाने लगे। आज टेनिस, फुटबॉल, बास्केट बॉल, बॉक्सिंग, स्क्वाश, गोल्फ जैसे खेलों में पैसों की बरसात हो रही है।
        खेलों की लोकप्रियता और खिलाड़ियों की कमाई की बात करें तो आज क्रिकेट ने, जो दुनिया के गिने-चुने ही देशों में खेला जाता है, लोकप्रियता की नई ऊँचाइयाँ हासिल की हैं। किक्रेट में कारपोरेट जगत के रझान के कारण नवोदित क्रिकेटर भी अन्य खिलाड़ियों की तुलना में अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं।
        खेलों में धन की बरसात में कोई बुराई नहीं है। इससे खेलों और खिलाड़ियों के स्तर में सुधार ही होता है, लेकिन उसका बदसूरत पहलू यह भी है कि खेलों में गलाकाट स्पर्धा के कारण इसमें फिक्सिंग और डोपिंग जैसी बुराइयों का प्रचलन भी बढ़ने लगा है। फिक्सिंग और डोपिंग जैसी बुराईयाँ न खिलाड़ियों के हित में हैं और न खलों के। खेल-पत्रकारिता की यह जिम्मेदारी है कि वह खेलों में पनप रही उन बुराईयों के किरध्द लगातार आवाज उठाती रहे। खेलों में खेल भावना की रक्षा हर कीमत पर होनी चाहिए। खेल पत्रकारिता से यह उम्मीद भी की जानी चाहिए कि आम लोगों से जुड़े खेलों को भी उतना ही महत्त्व और प्रोत्साहन मिले जितना अन्य लोकप्रिय खेलों को मिल रहा है।

3- महिला पत्रकारिता :-
 ( Women journalism )
       पत्रकारिता जैसे व्यापक और विशद विषय में महिला पत्रकारिता की अवधारणा भले ही कुछ अटपटी लगती है, किंतु नारी स्वातंत्र्य और समानता के इस युग में भी आधी दुनिया से जुड़े ऐसे अनेक पहलू हैं जिनके महत्त्व को देखते हुए महिला पत्रकारिता की अलग विधाकी आवश्यकता महसूस होती है।
               पुरुष और नारी के भेद का सबसे बड़ा आधार तो उनकी अलग शारीरिक संरचना है। प्रकृति ने फुरष को एक सांचे में ढाला है तो नारी को उससे अलग। एक समय था जब समाज फुरष प्रधान हुआ था। फुरष प्रधान समाज ने अपनी सुविधानुसार नारी को अबला बनाकर घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया था। विकास के निरंतर तेज गति से बदलते दौर ने महिलाओं को प्रगति का समान अवसर दिया और महिलाओ ने अपनी प्रतिभा और लगन के बलबूते पर समाज के हर क्षेत्र में अपनी आमिट छाप छोड़ने का जो सिलसिला शुर किया वह लगातार जारी है। आज के दौर में कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जहाँ महिलाओ की सशक्त उपस्थिति नहीं महसूस की जा रही हो। वर्तमान दौर में राजनीति, प्रशासन, सेना, शिक्षण, चिकित्सा, विज्ञान, तकनीक, उद्योग, व्यापार, समाजसेवा आदि प्रमुख क्षेत्रों में महिलाओ ने अपनी प्रतिभा और क्षमता के आधार पर अपनी राह खुद बनाई है। कई क्षेत्रों में तो कड़ी स्पर्धा और कठिन चुनौती के बावजूद महिलाओ ने अपना शीर्ष मुकाम बनाया है। भारत की इंदिरा नूई, नैनालाल किद्वाई, चंदा कोचर आदि महिलाओ ने सफलता के जिस शिखर को छुआ है वे सभी कड़ी स्पर्धावाले क्षेत्र माने जाते हैं।
                  तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश तथा महिला फुरष समानता के इस दौर में महिलाएँ अब घर की दहलीज लाँघकर बाहर आ चुकी हैं। प्रायः हर क्षेत्र में महिलाओ की उपस्थिति और भागीदारी नजर आती है। शिक्षा ने महिलाओ को अपने आधिकारों के प्रति जागरक बनाया है। अब महिलायें भी अपने करियर के प्रति सचेत हैं। महिला जागरण की इस नवचेतना के साथ-साथ महिलाओ के प्रति अत्याचार और अपराध के मामले भी बढ़े हैं। महिलाओ की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुत सारे कानून बने हैं और आवश्यकतानुसार उसमें समय-समय पर संशेधन भी किये जाते रहे हैं। महिलाओ को सामाजिक सुरक्षा दिलाने में महिला पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है। महिला पत्रकारिता की आज अलग से जररत ही इसलिए है कि उसमें महिलाओ से जुड़े हर पहलू पर गौर किया जाए और महिलाओ के सर्वांगीण विकास में यह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सके। महिला पत्रकारिता की सार्थकता महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से जुड़ी है।
                  कुछ प्रमुख महिला पत्रकारः मृणाल पांडे, विमला पाटील, बरखा दत्त, सीमा मुस्तफा, तवलीन सिंह, मीनल बहोल, सत्या शरण, दीना वकील, सुनीता ऐरन, कुमुद संघवी चावरे, स्वेता सिंह, पूर्णिमा मिश्रा, मीमांसा मल्लिक, अंजना ओम कश्यप, नेहा बाथम, मिनाक्षी कंडवाल आदि। आज भारत में पत्रकारिता के क्षेत्र में महिला पत्रकारों के आने से देश के हर लड़की को अपने जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल रही है।

4- बाल-पत्रकारिता :-
( Hair-journalism )
         बाल-मन स्वभावतः जिज्ञासु और सरल होता है। जीवन की यह वह अवस्था है जिसमें बच्चा अपने माता-पिता, शिक्षक और चारो तरफ के परिवेश से ही सीखता है। यही वह उम्र होती है जिसमें बच्चे के मास्तिष्क पर किसी भी घटना या सूचना की आमिट छाप पड़ जाती है। बच्चे के आस-पास की परिवेश उसके व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।                                                                     
                 एक समय था जब बच्चों को परीकथाओं, लोककथाओं, पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक कथाओं के माध्यमसे बहलाने-फुसलाने के साथ-साथ उनका ज्ञानवर्ध्दन किया जाता था। इन कथाओं का बच्चों के चारित्रिक विकास पर भी गहरा प्रभाव होता था।
        आज संचार क्रांति के इस युग में बच्चों के लिए सूचनातंत्र काफी विस्तृत और अनंत हो गया है। कंम्प्यूटर और इंटरनेट तक उनकी पहुँच ने उनकी जिज्ञास को असीमित बना दिया है। ऐसे में इस बात की भी आशंका और गुंजाइश बनी रहती है कि बच्चों तक वे सूचनायें भी पहुँच सकती हैं, जिससे उनके बालमन के भटकाव या विकृती भी संभव है। ऐसी स्थिती में बाल पत्रकारिता की सार्थक सोच और दिशा बच्चों को सही दिशा की ओर अग्रसर कर सकती है। बाल पत्रकारिता की दिशा में प्रिंट और विजुअल मीडिया (द्दश्य-माध्यम) के साथ-साथ इंटरनेट की भी अहम और जिम्मेदार भूमिका हो सकती है।

5- आर्थिक पत्रकारिता :-
( Economic journalism )
       कोई भी ऐसा व्यापारिक या आर्थिक व्यवहार जो व्यक्तियों, संस्थानों, राज्यों या देशों के बीच होता है, वह आर्थिक पत्रकारिता के सरोकारों में शामिल है।
               आर्थिक पत्रकारिता आर्थिक व्यवहार या अर्थ-व्यवस्था के व्यापक गुण-दोषों की समीक्षा और विवेचना की धुरी पर केंद्रित है। जिस प्रकार पत्रकारिता का उद्ददेश्य किसी भी व्यवस्था के गुण-दोषों को व्यापक आधार पर प्रचारित प्रसारित करना है, उसी प्रकार आर्थिक पत्रकारिता की भूमिका तभी सार्थक है जब वह अर्थ व्यवस्था के हर पहलू पर सूक्ष्म नजर रखते हुए उसका विश्लेषण करे और समाज पर पड़ने वाले उसके प्रभावों का प्रचार-प्रसार करने में सक्षम हो। अर्थ-व्यवस्था के मामले में आर्थिक पत्रकारिता व्यवस्था और उपभोक्ता के बीच सेतु का काम करने के साथ-साथ एक सजग प्रहरी की भूमिका भी निभाती है।
        आर्थिक उदारीकरण और विभिन्न देशों के आपसी व्यापारिक संबंधों ने पूरी दुनिया के आर्थिक परिद्दश्य को बहुत व्यापक बना दिया है। आज किसी भी देश की अर्थ-व्यवस्था बहुत कुछ आंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों पर निर्भर हो गई है। दुनिया के किसी कोने में मची आर्थिक हलचल या उथल-पुथल अन्य देशों की अर्थ-व्यवस्था को प्रभावित करने लगी है। सोने और चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं तथा कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव से आज दुनिया की कोई भी अर्थ व्यवस्था अछूती नहीं रही।
       यूरो, डॉलर, पांड, येन जैसी मुद्रायें तथा सोना, चाँदी और कच्चा तेल आज दुनिया की प्रमुख अर्थ व्यवस्थाओं की नब्ज बन चुकी हैं। कहने का तात्पर्य यह कि आज भले ही सभी देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं के नियामक और नियंत्रक हों किन्तु विश्व की आर्थिक हलचलों से वे अछूते नहींहैं। हम कह सकते हैं कि आर्थिक परिद्दश्य पर पूरा विश्व व्यापक तौर पर एक बाजार नजर आता है। सभी देशों की अर्थ व्यवस्थायें आज इसी वैश्विक बाजार की गतिविधियों से निर्धारित होती हैं। मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देशों में होनेवाले महत्त्वपूर्ण आर्थिक परिवर्तनों से दुनिया के प्रमुख देश भी प्रभावित होते है। आर्थिक पत्रकारिता के लिए विश्व का आर्थिक परिवेश एक चुनौती है। आर्थिक पत्रकारिता का यह दायित्व है कि विश्व की अर्थव्यवस्था को पभावित करनेवाले विभिन्न कारकों का विश्लेषण वह लगातार करती रहे तथा उनके गुण-दोषों के आधार पर एहतियाती उपयों की चर्चा आर्थिक पत्रकारिता का व्यापक हिस्सा बने।
               आर्थिक पत्रकारिता के समक्ष एक बड़ी चुनौती करवंचना, कालाधन और जाली नोटों की समस्या है। कालाधन आज विकसित और विकासशील देशों के लिए एक बड़ी समस्या बना हुआ है। काला धन भ्रष्टाचार से उपजता है और भ्रष्टाचार को ही बढ़ाता है। भ्रष्टाचार की व्यापकता अंततः देश के विकास में बाधक बनती है। कालाधन और आर्थिक अपराधों को उजागर करनेवाली खबरों के व्यापक प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी भी आर्थिक पत्रकारिता का हिस्सा है।
              भारत जैसे कृषि प्रधान देश में हमारी अर्थ व्यवस्था काफी कुछ कृषि और कृषि उत्पादों पर निर्भर है। भारत में तेजी से विकसित हो रहे नगरों और महानगरों के बावजूद आज भी देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गाँवों में ही बसती है। देश के बजट प्रावधानों का एक बड़ा हिस्सा कृषि एवं ग्रामीण विकास के मद में खर्च होता है। आर्थिक पत्रकारिता का एक महत्त्वपूर्ण आयाम कृषि एवं कृषि आधारित योजनाओ तथा ग्रामीण विकास के कार्यक्रमों का कवरेज भी है। ग्रामीण विकास के बिना देश का विकास और आर्थिक पत्रकारिता का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा। व्यापार के परंपरागत क्षेत्रों के अलावा रिटेल, बीमा, संचार, विज्ञान एवं तकनीक जैसे व्यापार के आधुनिक क्षेत्रों ने आर्थिक पत्रकारिता को व्यापक क्षितिज और नया आयाम दिया है। देश की अर्थव्यवस्था को सही दिशा देकर उसे सुचार और सुदृढ़ बनाना आर्थिक पत्रकारिता के लिए चुनौती तो है ही उसकी सार्थकता भी इसी में निहित है।

6- प्रमुख पत्र – पत्रिकाऍ :-
Major papers-magazines 
               इकॉनॉमिक टाईम्स, फाइनेंशियल एक्सप्रेस, बिजनेस स्टैण्डर्ड, बिजनेस लाइन, मनी कंट्रोल, इकॉनामिक वेल्थ, मिंट, व्यापार आदि।
                                 
       
                      
पत्रकारिता के अन्य रूप :-
( Journalism other form of )

1. ग्रामीण पत्रकारिता
2. व्याख्यात्मक पत्रकारिता
3. विकास पत्रकारिता
4. संदर्भ पत्रकारिता
5. संसदीय पत्रकारिता
6. रेडियो पत्रकारिता
7. दूरदर्शन पत्रकारिता
8. फोटो पत्रकारिता
9. विधि पत्रकारिता
10. अंतरिक्ष पत्रकारिता
11. सर्वादय पत्रकारिता
12. चित्रपट पत्रकारिता

                                                                                ★★★
 



मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

डिग्री एवं डिप्लोमा हेतु प्रोजेक्ट रिपोर्ट और लघु शोध प्रबंध


डिग्री एवं डिप्लोमा हेतु प्रोजेक्ट रिपोर्ट और लघु शोध प्रबंध
(Topics for Project Report and Dissertation)

                  पत्रकारिता एवं जन संचार में मास्टर्स डिग्री (MJMC) हेतु लघु शोध प्रबंध और पीजी डिप्लोमा (PGDJMC) , प्रसारण पत्रकारिता एवं न्यू मीडिया में पीजी डिप्लोमा (PGDBJNM) और विज्ञापन एवं जनसंपर्क में पीजी डिप्लोमा (PGDAPR) के शिक्षार्थियों के लिए प्रोजेक्ट रिपोर्ट।

लघु शोध प्रबंध/ प्रोजेक्ट रिपोर्ट :-
(Dissertations/ project reports)            
                 लघु शोध प्रबंध का आशय यह है कि शिक्षार्थी एक विषय का गहन अध्ययन प्रस्तुत करे। इस बहाने उसे मीडिया क्षेत्र को गहराई से जानने - समझने का अवसर मिले और उस विषय के बारे में अर्जित ज्ञान का बेहतरीन प्रदर्शन करे। साथ ही जहां जरूरी हो शोध प्रविधि का भी इस्तेमाल करे। शोध प्रबंध को कम से कम 50 पृष्ठ का होना चाहिए जबकि प्रोजेक्ट रिपोर्ट के लिए कम से कम 40 पृष्ठ निर्धारित हैं।
                  जिन छात्रों ने परीक्षा का माध्यम हिन्दी अपनाया है, वे हिन्दी में और जिन छात्रों ने अंग्रेज़ी में परीक्षा का विकल्प चुना है, वे अंग्रेज़ी में ही प्रोजेक्ट रिपोर्ट या लघु शोध प्रबंध लिखें। जहां जरूरी हो, फोटो, कार्टून, चित्र आदि लगाना ना भूलें. साथ ही सन्दर्भों का जरूर हवाला दें। लघु शोध प्रबंध/ प्रोजेक्ट रिपोर्ट आपकी मौलिक रचना होनी चाहिए, नक़ल की हुई नहीं. इनके अतिरिक्त यदि किसी के पास अपना अभिनव विचार हो तो सूचित करें। अधोहस्ताक्षरी की लिखित अनुमति के बाद ही नए विषय पर लघु शोध/ प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार किया जा सकता है।
समस्त शिक्षार्थियों/ अध्ययन केन्द्रों से अनुरोध है कि वे अपना लघु शोध प्रबंध/ प्रोजेक्ट रिपोर्ट बाईंड करवा के परीक्षा नियंत्रक, उमुविवि, हल्द्वानी को ही भेजें।

APR
निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर कम से कम 40 पेज का प्रोजेक्ट तैयार कीजिए:
1-    जनसंपर्क अधिकारी : योग्यता, कार्य और दायित्व :
            अपने जिले के सूचना अधिकारी या अपने इलाके के किसी जाने-माने संस्थान के जन संपर्क अधिकारी के पास जाइए और उनके कार्यों, दायित्वों, कार्यशैली और दिनचर्या के बारे में पूछिए। तमाम जानकारियों पर आधारित एक प्रोजेक्ट तैयार कीजिए।

2-  भ्रमित करने वाले विज्ञापन :
                  मैगी नूडल्स प्रकरण के बहाने अब तक प्रकाश में आये ऐसे विज्ञापनों और प्रचार- अभियानों पर एक प्रोजेक्ट तैयार कीजिए। इस मुद्दे के तमाम पहलुओं को उजागर करते हुए एक समग्र रिपोर्ट तैयार कीजिए।

BJNM
निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर कम से कम 40 पेज का प्रोजेक्ट तैयार कीजिए:

1-   मन की बात और रेडियो :
                   प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम और उसके प्रभाव पर कमसे कम 20 श्रोताओं और विशेषज्ञों से बातचीत कीजिए और एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट लिखिए।
2-  टीवी पत्रकारिता: स्वरुप और चुनौतियां :
अपने इलाके के किन्हीं दो जाने-माने टीवी पत्रकारों से उनके कार्यों, दायित्वों, टीवी पत्रकारिता और जीवनचर्या पर वीडियो इंटरव्यू लेकर उसकी स्क्रिप्ट के साथ सीडी प्रस्तुत करें।

PGDJMC
1-   मीडिया पत्रकारिता :

मीडिया से सम्बंधित निम्न में से किन्हीं तीन वेबसाइटों का विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए.
http://www.newswriters.in
http://www.bhadas4media.com
http://www.jansattaexpress.in
http://www.mediakhabar.com
http://www.samachar4media.com
http://www.exchange4media.com/
http://www.indiantelevision.com/
http://www.afaqs.com/

2-   कृषि पत्रकारिता :
                 अपने इलाके के किन्हीं दो अखबारों की कृषि की कवरेज का तुलनात्मक विवेचन कीजिए.

MJMC
1-    किसान चैनल और कृषि पत्रकारिता :
                   किसान चैनल के आने से कृषि पत्रकारिता में नई हलचल हुई है। कृपया कृषि पत्रकारिता के समग्र परिदृश्य का खाका प्रस्तुत कीजिए।

2-    सोशल मीडिया के फायदे और नुकसान :
                   इस मुद्दे पर कम से कम 20 लोगों से बातचीत कर विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए। लोगों में युवा, स्कूली बच्चे, शिक्षक, वकील, पत्रकार सभी हों।